Bihar ki Lakh ki chudiyan

बिहार में मधुबनी जिला झंझारपुर स्थित पुरानी बाजार में लाख की चूड़ियां बनाई जाती है। यहाँ के लहरी टोला में एक दर्जन से ज्यादा लाख (लाह) की चूडियों की छोटी बड़ी दुकानें हैं,जहां Lakh ki chudiyan बनाई भी हैं और बेची भी हैं। मधुबनी के अलावा और भी जैसे दरंभगा,समस्तीपुर और मुजफ्फरपुर में भी इन चूड़ियों का काम होता है।

ये काम इतने बड़े पैमाने पे होता है कि इसके लिए एक संघ गठित किया गया है। इस महासंघ के अध्यक्ष मोहन प्रसाद साहन है। जो मधुबनी के ही रहने वाले है और यही पर मधुबनी स्थित कोतवाली चौक के पास इनकी चूड़ियों की दुकान भी है।

लाख क्या होता है और Lakh ki chudiyan बनाई कैसे जाती है ?

लाख एक प्रकृति के द्वारा दिया गया एक उत्पाद है जो छोटे छोटे कीड़ों से निकलने वाले चिपचिपे पदार्थ से तैयार किया जाता है। लाख की खेती झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में होती है। लाख उत्पादन करने के लिए कुसुम,पलास जैसे पेड़ों पर इन छोटे छोटे कीटों को पाला जाता है। पेड़ों से लाख वाली टहनियों को काट लिया जाता है। और इस तरह लाह का उत्पादन किया जाता है।

लाख को धीमी धीमी आंच पर गर्म करके इनका आकार बदल कर कंगन और चूड़ियाँ का रूप दे दिया जाता है। ये काम बरसों से परंपरागत तरीके से पीढ़ी दर पीढ़ी होता आ रहा है। ऐसे तो ये सालो भर बिकता है पर इन चूड़ियों की मांग पर्व-त्योहार और शादियों के मौसम में अधिक हो जाती है। Lakh ki chudiyan निर्माण के लिए जयपुर, मुरादाबाद, बनारस, देवघर, बिहार में मुजफ्फरपुर का इस्लामपुर प्रसिद्ध है। यहां 50 रुपये से लेकर लाख से अधिक मूल्य की बेशकीमती चूड़ी आर्डर पर बनाया जाता है।

Bihar ki Lakh ki chudiyan
Bihar ki Lakh ki chudiyan

लाह के रंग बिरंगी चूड़ियां

लाह से हर बेराइटी की रंग बिरंगी चूड़ी कंगन बनाया जाता है। मेटल पर लाह बैठाकर उस पर खूबसूरत कारीगरी की जाती है। दुल्हनों के लिए खास तौर पर कंगन सेट यहां तैयार किया जाता है। जिसकी डिमांड भारत वर्ष में बहुत है जिसकी कीमत 500 से शुरू हो जाती है। बड़े सेठ साहुकार बिल्डर स्पेशल आर्डर देकर सोने से बनी आकारों पर लाह और कीमती नक्शे तैयार लहठी बनवाते हैं। ऐसे कंगन सेट की कीमत लाखों में होती है।

सरकार की घोषणा के बाद भी नहीं बना कला ग्राम

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सत्ता सँभालने के बाद ऐसे गांवों को एक विशेष दर्जा देने की बात कही थी पर ये आज तक पूरा न हो पाया। जिन गांवों में कला शिल्प कार्य हो रहा है इस गांवों को कला ग्राम घोषित करने की बात कही गई थी जो अभी तक संभव नहीं हो पाया है। आलम यह है कि यहां का चूड़ी उद्योग बंद होने के कगार पर पहुंचने वाला है पर सरकार का इस तरफ कोई ध्यान नहीं है। हम इस blog के माध्यम से सरकार का ध्यान इस पर आकर्षित करना चाहते है।

सरकार के ऐसे हाल को देखते हुए बिहार के कारीगर का पलायन हो रहा है। ये बिहार सरकार की बहुत बड़ी नाकामी है जो नए उद्योग तो ला नहीं पा रहे है और जो है उसपर ध्यान नहीं दे रहे है। इस पर सरकार को ध्यान देना चाहिए और ताकि ये एक अच्छा उद्योग धंधा बन सके।

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