Champaran Satyagraha | महात्मा गांधी

सत्याग्रह शब्द हिंदी से आता है जिसका मतलब सत्य के लिए आग्रह करना होता है।

Champaran satyagraha आंदोलन हमारे देश के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटना के रूप में जाना जाता है। यह भारत देश का पहला सत्य के लिए आंदोलन था जिसे महात्मा गांधी ने बिहार के चम्पारण जिले में किसानों के उपर हो रहे अन्याय के विरोध में किया था। आइये champaran satyagraha आंदोलन के बारे में विस्तार से पढ़ें।

यह घटना 1917 की है। जब चम्पारण के किसानों पर अत्याचार दिनों दिन बढ़ता जा रहा था। अँग्रजी शाषको ने एक नियम किसानों पर लागू किया, किया क्या मानो थोप दिया गया था जिसका नाम तीनकठिया रखा था। इस नियम के मुताबिक सभी किसानों को अपनी जमीन के 15 प्रतिशत हिस्से पर नील की खेती करनी पड़ती थी। और अगर कोई इस नियम को ना माने तो खेतों की नीलामी, घर की नीलामी के साथ साथ पिटाई भी खानी पढ़ती थी। उस समय यह खेती लगभग 91000 एकड़ जमीन पर की जाती थी जो आगे चलकर 8100 एकड़ तक सीमट कर रह गई थी। यह सभी नील की खेती चम्पारण के आस पास के इलाको में अधिकतर की जाती थी।

गाँधी जी उस समय दक्षिण अफ्रीका में अपने राजनैतिक आंदोलनों के लिए काफी नाम कमाया था। इसी से प्रभावित होकर पट्टेदार नेता राजकुमार शुक्ला और पत्रकार पीर मोहम्मद मुनिस गाँधी जी को यहाँ लाना चाहते थे।

Champaran satyagraha आंदोलन को चम्पारण किसान आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है।

champaran satyagraha by mahatma gandhi

भारत में हुई पहल

11 अप्रैल को गाँधी जी चम्पारण के पास मुजफ्फरपुर में रुक कर किसानों की सारी समस्या को सुना।

15 अप्रैल 1917 को चंपारण के मोतिहारी पहुंचे।

16 अप्रैल को गांधी जी हाथी पर सवार होकर गांव जसौलपट्टी पहुंचे, जहां नील की खेती करने वाले मजदूरों ने ब्रितानी मालिकों के द्वारा हो रहे अन्याय की शिकायत की थी। गांधी जी को बीच रास्ते एक सिपाही ने रोका और गांधी जी को वहां से मोतिहारी वापस आना पढ़ा। जिला न्यायाधीश ने गांधी जी को अगली रेलगाड़ी से जिला छोड़ के जाने का निर्देश दिया। गांधी जी ने इसे मानने से मना कर दिया और वाइसराय को पत्र लिखा।

17 अप्रैल को ब्रितानी सरकार द्वारा दी गई ‘कैसर-ए-हिंद’ उपाधि साबरमती आश्रम को लौटाने के लिए कहा।

18 अप्रैल को गांधी जी ने नील की खेती करने वाले किसानों से गवाही लेनी शुरू कर दी। और उसी दिन दोपहर को न्यायाधीश के सामने उपस्थित हुए। उनसे कहा कि वह जिला न्यायाधीश के आदेश को न मानने के लिए मजबूर हैं और चंपारण में ही रुकने का निर्णय लिया।

20 अप्रैल को लेफ्टिनेंट गवर्नर की सलाह पर गांधी के खिलाफ कानूनी कार्य रोक दी गई। चंपारण में गांधी की मौजूदगी से भयभीत होकर बिहार प्लांटर्स एसोसिएशन और यूरोपियन डिफेंस एसोसिएशन ने शिकायती पत्र लिखे और प्रस्ताव लाए। उन्हें यह भय होने लगा कि चंपारण में गांधी की मौजूदगी से उनके हितों पर काफी बुरा असर पडे़गा।

22 अप्रैल के बाद गांधी जी ने गांवों में जाना शुरू कर दिया, अकसर वह पैदल ही यात्रा करते थे। गवाही इकट्ठा करने के मकशद से वह कई मौकों पर गांवों में रातभर भी रुका करते थे।

25 अप्रैल को कुछ ऐसा हुआ कि बेतिया के उपप्रभागी न्यायाधीश ने कहा, ‘ ब्रितानी मालिकों द्वारा गांधी को अपना दुश्मन मानना बेहद स्वाभाविक है।’, ‘पर गांधी रैयतों के लिए मुक्तिदाता हैं।’

4 जून को गांधी जी रांची पहुंचे और लेफ्टिनेंट गवर्नर सर एडवर्ड गैट को किसानों के गवाह-पत्र साझा किए।

10 जून को चंपारण में कृषि जांच समिति का गठन किया गया। इसमें गांधी जी के अलावा भारतीय सिविल सेवा के चार ब्रितानी अफसरों और केंद्रीय सूबों के कमिश्नर एफजी स्लाई को जोड़ा गया।

जुलाई-अगस्त महीने में बेतिया, मोतिहारी और आसपास के गांवों में समिति की कई सारी मीटिंग हुईं। इसी दौरान गांधी जी ने चंपारण में कई स्कूल खोले। इसमें कस्तूरबा गांधी ने उनका खूब सहयोग किया।

3 अक्तूबर को समिति ने अपनी रिपोर्ट पेश की। गांधी जी मोतिहारी की ओर चल दिए।

11 अक्तूबर को गांधी बेतिया पहुंचे, जहां लगभग चार हजार लोगों का समूह स्टेशन पर उनके आने का इंतजार कर रहे थे।

13 अक्तूबर को गांधी अहमदाबाद की ओर रवाना हुए।

नवंबर महीने में महादेव देसाई गांधी जी के सचिव बने।

4 मार्च 1918 को गवर्नर-जनरल ने चंपारण एग्रेरियन बिल पर हस्ताक्षर किए। इसके साथ ही तीनकठिया व्यवस्था का अंत हुआ।

दोस्तों ये चम्पारण सत्याग्रह की पूरी कहानी है।

बिहार Explore का यह blog आपको कैसा लगा आप हमें comment कर सकते है, अच्छा लगा तो like भी कर सकते है। हम फिर अगले ब्लॉग में आपसे कुछ नये topic पे बातें करेंगे तब तक के लिए धन्यवाद।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *