पर्वत पुरुष दशरथ मांझी

यूं तो विश्व में प्रेम के प्रतीक अनेक इमारतें और महले है, लेकिन ये अमीर शासकों अथवा धनवान व्यक्ति के द्वारा निर्माण कराया गया होता है, किंतु एक ऐसा दृढ़ निश्चयी व्यक्ति दशरथ मांझी जिन्होंने प्रेम भाव में विभोर होकर पहाड़ का सीना चीर दिया और आज हम उन्हें सम्मान से पर्वत पुरुष की संज्ञा देते हैं।     

किंवदंती है कि खोजने से मनुष्य को ईश्वर भी मिल जाते हैं।यदि आप किसी कार्य को पूरी निष्ठा और लगन से संकल्पित होकर करते हैं तो असंभव कार्य भी संभव हो जाता है। व्यक्ति को प्रेम प्रदर्शन के लिए धनवान होना आवश्यक नहीं, इस बात की बखूबी मिसाल दशरथ मांझी हैं।

आइए हम जानते हैं दशरथ मांझी का जीवन परिचय:

प्रारंभिक जीवन:

दशरथ मांझी का जन्म 14 जनवरी 1929 को बिहार के गहलोर में एक दलित परिवार में हुआ था। गहलोर एक ऐसा गांव था, जहां ना तो सड़क की सुविधा थी ना ही पानी और बिजली की। यहां के लोग समाज के बदलावों से अभिनज्ञ थे। इतना ही नहीं उस गांव के जमींदारों और प्रभावशाली लोगों ने गांव वालों को बंधुआ मजदूर बना लिया था। मांझी के पिता भी बंधुआ मजदूर ही थे। कर्ज न चुका पाने की वजह से दशरथ के पिता उन्हें जमींदारों के हाथों बेच दिए, किंतु वे वहां से भाग निकले।

अपने गांव से दूर जाकर वे धनबाद में कोयले की खानो में काम करने लगे। कुछ वर्षों के बाद वह अपने गांव लौटे तो उन्होंने पाया की स्थिति ज्यों की त्यों है, कोई बदलाव नहीं हुआ है। गांव पहुंचने के बाद वे अपनी पत्नी फाल्गुनी देवी के साथ रहने लगे, गौर मतलब है कि उनका विवाह बाल्यकाल में ही हो गया था। वे खेतिहर मजदूर के रूप में अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करने लगे।उनका गांव गहलोर शहर से 55 किलोमीटर से अधिक दूरी पर था किंतु पहाड़ पार करने के बाद सरलता से वहां कम समय में और कम दूरी तय कर पहुंचा जा सकता था, किंतु पहाड़ों का रास्ता बहुत पथरीला और संकीर्ण था जहां से गिरने के बाद लोगों का जीवित बचना नामुमकिन था।

दशरथ मांझी के जीवन की वह घटना जिसे उन्हें पूर्ण परिवर्तित कर दियादशरथ मांझी की पत्नी फाल्गुनी देवी को भी पानी लाने हेतु पहाड़ों को पार करना पड़ता था और पानी लाने के सिलसिले में वे पहाड़ों से गिर पड़ी। ऐसी स्थिति में वह गंभीर रूप से चोटिल हो चुकी थी और शहर में अस्पताल काफी दूरी पर था, वहां पहुंचने पर इलाज के क्रम में उनकी गर्भवती पत्नी की मृत्यु हो गई।


पर्वत के बीच मार्ग निर्माण कार्य:

दशरथ के दिमाग में यह बात घर कर गई थी कि यदि इन पहाड़ों के बीच रास्ते होते तो उनकी पत्नी जीवित होती, और यही सोचकर वे अकेले ही निकल पड़े पहाड़ तोड़ने। गांव के लोग इस बात पर उनका उपहास करने लगे और उन्हें सनकी और पागल बोलने लगे थे।

उनके पिता ने भी उन्हें बहुत समझाया कि तुम अकेले क्या कर सकते हो, लेकिन इरादों के पक्के दशरथ मांझी ने हार नहीं मानी। काफी वर्ष बीत जाने पर गांव में अकाल पड़ गया था, सभी ग्रामवासी शहरों की तरफ जा रहे थे, किंतु दशरथ अपने पिता के साथ अपने दोनों बच्चों को भेजकर स्वयं पहाड़ तोड़ते रहे। अकाल के बाद जब पूरा गांव वीरान हो चुका था तब वापस सभी गांव लौटे, वे यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि मांझी अब तक पहाड़ तोड़ रहे थे।

आपातकाल के समय मांझी:

1975 में देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जब एक जनसभा में पहुंची, तब वहां दशरथ मांझी की मुलाकात उनसे हुई तथा उनकी तस्वीरों के साथ उनके संघर्ष की कहानी अखबारों के शीर्ष पर छापी गई। सरकार के तरफ से उन्हें आर्थिक मदद की गई किंतु गांव के जमींदारों ने उस राशि को दशरथ को ना देकर खुद हड़प लिया।मांझी को जब इस बात का पता चला तो वे सरकारी कार्यालय में पहुंचे। वहां उन्हें राशि दी जा चुकी है ऐसा बोल कर अपमानित कर भेज दिया गया।

बिहार से दिल्ली तक की पैदल यात्रा:

मांझी ने हार नहीं मानी और उन्होंने दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलने का फैसला लिया। ट्रेन पर चढ़ने के बाद उनके पास टिकट ना होने की वजह से अपमानित कर उतार दिया गया। वही मांझी ने फैसला किया कि वे बिहार से दिल्ली पैदल ही जाएंगे। 1300 किलोमीटर की यात्रा कर बिहार से दिल्ली पहुंचे किंतु उन्हें प्रधानमंत्री से मिलने नहीं दिया गया।

पहाड़ों में बनाया रास्ता:

मांझी ने तब भी हार नहीं मानी और वापस गांव पहुंच कर अपने काम में जुट गए,किंतु इस बार उनके गांव के लोग जो उन्हें पागलों की संज्ञा देते थे, उनका साथ देने लगे।22 वर्षों में (1960 से 1982) तक कठिन परिश्रम कर मांझी ने 360 फुट लंबा, 25 फुट गहरा, 30फुट चौड़ा गेहलौर की पहाड़ियों के बीच से वजीरगंज का रास्ता निकाला जो 55 किलोमीटर से घटकर 15 किलोमीटर की दूरी बन गई थी।

अभाव में रहे किंतु दृढ़ निश्चयी बने रहे:

मांझी जी का जीवन अत्यंत गरीबी से भरा रहा।सरकार द्वारा दी गई उनकी आर्थिक सहयोग की राशि को गांव के जमींदारों द्वारा गबन कर लिया गया, वहीं 2014 में सत्यमेव जयते नामक चर्चित शो के मेजबान आमिर खान ने भी उनके परिजनों से आर्थिक सहायता देने का वादा किया किंतु उनकी सहायता नहीं की गई।

सम्मान व पुरस्कार:

उनके योगदान के लिए “माउंटेन मैंन” अर्थात पर्वत पुरुष: दशरथ मांझी की संज्ञा दी है। बिहार सरकार ने 2006 में पद्मश्री पुरस्कार हेतु उनका नाम चयनित किया था। वहीं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गहलोर से 3 किलोमीटर पक्की सड़क के निर्माण और उनके नाम पर एक अस्पताल निर्माण का प्रस्ताव रखा।उनकी जीवनी पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म “Manjhi the mountain man” का निर्माण किया गया था जिसके निर्देशक केतन मेहता थे।फिल्म में बखूबी उनके जीवन चित्र को दर्शाया गया है।प्रख्यात लेखक सुनील कुमार सिन्हा एवं नैंसी आदि ने भी उनके जीवन पर पुस्तके लिखे हैं तथा वे पूरे भारतवर्ष में अपने दृढ़ निश्चय द्वारा पहाड़ तोड़कर रास्ता बनाने के लिए विख्यात है।

निधन:

दशरथ मांझी की मृत्यु 78 वर्ष की उम्र में 17 अगस्त 2007 को पित्ताशय के कैंसर की वजह से हो गई, उस समय वह अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में इलाज हेतु भर्ती थे।

दशरथ मांझी यूं तो हमारे बीच नहीं है किंतु युवाओं के लिए एक प्रेरणा स्रोत हैं। वैसे युवा जो अभाव से हार मानकर मायूस हो जाते हैं, उनके लिए मांझी एक ऐसी मिसाल है जिससे वे प्रेरणा मान कर दृढ़ निश्चयकर किसी भी लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।

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